नाम : अबुल-फतह जलाल उद्दीन मुहम्मद अकबर

जन्म : 15 अक्तुबर, 1542 अमरकोट

पिता : हुमांयू 

माता : नवाब हमीदा बानो बेगम साहिबा


 अकबर हुमायु के बेटे थे, जिन्होंने पहले से ही मुघल साम्राज्य का भारत में विस्तार कर रखा था। 1539-40 में चौसा और कन्नौज में होने वाले शेर शाह सूरी से युद्ध में पराजित होने के बाद मुघल सम्राट हुमायु पश्चिम की और गये जहा सिंध में उनकी मुलाकात 14 साल की हमीदा बानू बेगम जो शैख़ अली. अकबर की बेटी थी, उन्होंने उनसे शादी कर ली और अगले साल ही जलाल उद्दीन मुहम्मद का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को राजपूत घराने में सिंध के उमरकोट में हुआ (जो अभी पकिस्तान में है) जहा उनके माता-पिता को वहा के स्थानिक हिंदु राना प्रसाद ने आश्रय दिया।

मुघल शासक हुमायु के लम्बे समय के वनवास के बाद, अकबर अपने पुरे परिवार के साथ काबुल स्थापित हुए। जहा उनके चाचा कामरान मिर्ज़ा और अस्करी मिर्ज़ा रहते थे। उन्होंने अपनी पुरानी जवानी शिकार करने में, युद्ध कला सिखने में, लड़ने में, भागने में व्यतीत की जिसने उसे एक शक्तिशाली, निडर और बहादुर योद्धा बनाया। लेकिन अपने पुरे जीवन में उन्होंने कभी लिखना या पढना नहीं सिखा था। ऐसा कहा जाता है की जब भी उन्हें कुछ पढने की जरुरत होती तो वे अपने साथ किसी को रखते थे जिसे पढना लिखना आता हो। 1551 के नवम्बर में अकबर ने काबुल की रुकैया से शादी कर ली। महारानी रुकैया उनके ही चाचा हिंदल मिर्ज़ा की बेटी थी।

अकबर मात्र तेरह वर्ष की आयु में अपने पिता नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायुं की मृत्यु उपरांत दिल्ली की राजगद्दी पर बैठा था। अपने शासन काल में उसने शक्तिशाली पश्तून वंशज शेरशाह सूरी के आक्रमण बिल्कुल बंद करवा दिये थे, साथ ही पानीपत के द्वितीय युद्ध में नवघोषित हिन्दू राजा हेमू को पराजित किया था।अपने साम्राज्य के गठन करने और उत्तरी और मध्य भारत के सभी क्षेत्रों को एकछत्र अधिकार में लाने में अकबर को दो दशक लग गये थे। उसका प्रभाव लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर था और इस क्षेत्र के एक बड़े भूभाग पर सम्राट के रूप में उसने शासन किया। सम्राट के रूप में अकबर ने शक्तिशाली और बहुल हिन्दू राजपूत राजाओं से राजनयिक संबंध बनाये और उनके यहाँ विवाह भी किये।

                               साम्राज्य विस्तार 

अकबर अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था इसके लिए उसने सीधी संघर्ष करने वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने , अधीनता स्वीकार करने ,वालो को शासन में पद देने तथा मित्रता करने कीनीति अपनयायी. अकबर राजपूतो के साथ मित्रताका महत्त्व समझता था इसलिए उसने राजपूत परिवारों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर स्थिति को मजबूत किया और इसके लिए उसने जोधा से विवाह भी किया ।  

                      

अकबर ने आमेर , जोधपुर , बीकानेर ,जैसलमेर , के राजपूतो को दरवार में सम्मान जनक स्थान दिया . राजपूत राजा भगवान् दास तथा उनके पोते मानसिंह को दरवार में सबसे ऊँचा स्थान दिया | उसने हिंदुयो का जजिया कर की समाप्त कर हिंदुयो को खुश किया | 

                         

                            हल्दीघाटी का युद्ध


  

कई राजपूतो ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली परंतु मेवाड़ के माहाराणा प्रताप ने सर झुकाने से इनकार कर दिया , तो अकबर  की सेना और  माहाराणा प्रताप का सामना सं 1576 में हल्दीघाटी के मैदान में हुआ जो भारतीय  इतिहास में हल्दीघाटी के युद्ध  के नाम से पसंद है | माहाराणा प्रताप भीषण युद्ध करते हुए बुरी तरह घायल हुए , और उन्हें परिवार सहित जंगल जाना पढ़ा उन्होंने प्राण किया जब तक वह मेवाड़ को वापस नहीं ले लेंगे , वह घास की रोटी खाएंगे | जमीन पर सोएंगे और सभी सुखो का त्याग कर देंगे. |

                          

                           जोधाबाइ के साथ विवाह



जोधाबाइ और अकबर के विवाह के बाद जोधाबाइ कभी अपने माइके नहीं गयी। उन्हे राजपूतना खानदान ने सदा के लिए त्याग दिया था। अकबर के साथ विवाह के बाद जोधाबाइ, मरियम उज-जमनि बेगम साहिबा के नाम से जानी गयी।

 


                          अकबर बादशाह के नव रत्न 




1. बीरबल- (सन 1528 से सन1583) दरबार के विदूषक, परम बुद्धिशाली, और बादशाह के सलहकार।
2. फैजि-  (सन 1547 से 1596) फारसी कवि थे। अकबर के बेटे के गणित शिक्षक थे।
3. अबुल फज़ल-  (सन 1551 से सन 1602) अकबरनामा, और आईन-ए-अकबरी की रचना की थी।4. तानसेन-  (तानसेन उत्तम गायक थे। और कवि भी थे)।
5. अब्दुलरहीम खान-ए-खान- एक कवि थे, और अकबर के पूर्व काल के संरक्षक बैरम खान के बेटे थे।
6. फकीर अजिओं-दिन-  अकबर के सलाहकार थे।
7. टोडरमल-  अकबर के वित्तमंत्री थे।
8. मानसिंह- आमेर / जयपुर राज्य के राजा और अकबर की सेना के सेनापती भी थे।
9. मुल्लाह दो पिअजा- अकबर के सलहकार थे।

                                     कर निर्धारण

अकबर ने कर के वार्षिक मूल्यांकन को अधिकार के रूप में अपनाया, लेकिन यह वर्ष 1580 में विफल हो गया। इसके बाद उन्होंने दहसला नामक व्यवस्था को शुरू किया । अकबर शायद अपने राजस्व अधिकारियों के लिए एक लक्ष्य-आधारित पारिश्रमिक प्रणाली का प्रयोजन करने वाले पहले सम्राट थे। इसमें राजस्व अधिकारियों केवल तीन-चौथाई वेतन प्राप्त करना होता था और शेष राशि तब ही देनी होती थी, जब राजस्व लक्ष्य निर्धारित होते थे।

                                  साहित्य में उल्लेख                                                                             

अबुल फजल द्वारा आइने-ए-अकबरी और अकबरनामा तथा बदायुनी द्वारा शेखजादा रशीदी और शेख अहमद सरहिंदी पुस्तकें लिखी गई। अकबरनामा में फारसी में अकबर की जीवनी है।

                                   

                                 मृत्यु                                                                             


   
27 अक्टूबर 1605 में उनकी मृत्यु हो गई। उनका दफन कक्ष सिकंदरा, आगरा में एक मकबरे के रूप में बना है।



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